नक्कटैया: काशी की गलियों में रामलीला का सबसे अलग रूप
वाराणसी की गलियों में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते। वे शहर के जीवन का हिस्सा बन जाते हैं।
कभी कोई गली संगीत से भर जाती है। कभी घाटों पर दीपों की कतार लग जाती है। और कभी आधी रात के बाद सड़कों पर ऐसी भीड़ दिखाई देती है, मानो पूरा शहर किसी कहानी का हिस्सा बन गया हो।
नक्कटैया ऐसी ही एक परंपरा है।
काशी की चेतगंज की गलियों में होने वाली यह रामलीला सामान्य मंचीय रामलीला से काफी अलग दिखाई देती है। यहां रामायण का एक प्रसंग मंचित होता है। इसके बाद कथा केवल मंच तक सीमित नहीं रहती। वह सड़कों पर उतर आती है।
लाग-विमान निकलते हैं। झांकियां सजती हैं। कलाकार और पात्र दिखाई देते हैं। भीड़ रास्ते के दोनों ओर जमा होती है। रात गहराती जाती है, लेकिन काशी की सड़कें जागती रहती हैं।
इस आयोजन का केंद्र रामायण का शूर्पणखा प्रसंग है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, पंचवटी में शूर्पणखा का सामना राम और लक्ष्मण से होता है। कथा के आगे बढ़ने पर लक्ष्मण उसकी नाक काटते हैं। इसी घटना के नाट्य रूपांतरण को नक्कटैया कहा जाता है।
लेकिन चेतगंज की नक्कटैया की खासियत केवल यही प्रसंग नहीं है।
इसके साथ काशी की लोक-स्मृति, सामाजिक व्यंग्य, शिल्प, जुलूस और जनभागीदारी भी जुड़ी हुई है।
यही कारण है कि इसे केवल रामलीला कहना इसकी पूरी पहचान नहीं बताता।
नक्कटैया क्या है और इसका नाम कैसे पड़ा?
“नक्कटैया” शब्द को सामान्य तौर पर नाक काटने की घटना से जोड़ा जाता है।
रामायण की कथा में शूर्पणखा रावण की बहन बताई गई हैं। वनवास के दौरान उनका सामना राम, सीता और लक्ष्मण से होता है। आगे की कथा में लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की नाक काटने का प्रसंग आता है।
काशी की नक्कटैया इसी प्रसंग का लोकनाट्य रूप है।
हालांकि, यहां एक बात समझना जरूरी है।
यह आयोजन केवल किसी एक दृश्य की प्रस्तुति नहीं है। काशी में यह प्रसंग एक बड़े सार्वजनिक उत्सव का रूप ले चुका है।
चेतगंज में पहले लीला होती है। उसके बाद रात में शोभायात्रा निकलती है। इस यात्रा में धार्मिक झांकियों के साथ अलग-अलग विषयों पर आधारित लाग-विमान भी शामिल होते हैं।
यही बदलाव इसे दूसरी रामलीलाओं से अलग पहचान देता है।
मंच पर रामायण।
सड़क पर समाज।
और इन दोनों के बीच काशी का अपना लोकजीवन।
काशी की नक्कटैया की शुरुआत कब हुई?
नक्कटैया के इतिहास में एक छोटी-सी तारीख संबंधी असहमति दिखाई देती है।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के काशी संबंधी सांस्कृतिक अभिलेख में चेतगंज की इस लीला की शुरुआत लगभग 1887 ई. में बाबा फतेह राम द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। वहीं, चेतगंज रामलीला समिति से जुड़े विवरणों और कुछ समाचार रिपोर्टों में शुरुआत 1888 बताई गई है।
इसलिए शोधपरक लेख में किसी एक वर्ष को बिना संदर्भ के अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।
इतना जरूर स्पष्ट है कि चेतगंज की नक्कटैया की परंपरा 19वीं सदी के अंतिम वर्षों से जुड़ी है।
इसके संस्थापक के रूप में बाबा फतेह राम का नाम लगातार सामने आता है। IGNCA के सांस्कृतिक विवरण में भी बाबा फतेह राम को इस लीला की शुरुआत से जोड़ा गया है।
इससे नक्कटैया को काशी की पुरानी शहरी लोकपरंपराओं में स्थान मिलता है।
बाबा फतेह राम और चेतगंज की रामलीला
बाबा फतेह राम के बारे में उपलब्ध विवरण उन्हें रामभक्त और घूम-घूमकर रामलीला देखने वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
IGNCA के अनुसार, उन्होंने चेतगंज में एक नई रामलीला परंपरा शुरू की और इसके लिए चेतगंज रामलीला समिति की स्थापना की। शुरुआती दौर में आयोजन चंदे से चलता था। बाद में स्थानीय दुकानदारों से छोटी-छोटी आर्थिक भागीदारी लेने की व्यवस्था की गई।
यह विवरण नक्कटैया के एक महत्वपूर्ण पक्ष को सामने लाता है।
यह परंपरा किसी एक परिवार या कलाकार की निजी प्रस्तुति बनकर नहीं रही।
धीरे-धीरे पूरा मोहल्ला इससे जुड़ता गया।
दुकानदार जुड़े।
स्थानीय लोग जुड़े।
कारीगर जुड़े।
और समय के साथ यह सामूहिक आयोजन बन गया।
यही सामुदायिक भागीदारी काशी की कई लोकपरंपराओं की बड़ी ताकत रही है।
नक्कटैया और अंग्रेजी शासन की कहानी
नक्कटैया के इतिहास का सबसे रोचक हिस्सा इसका औपनिवेशिक दौर से जुड़ा लोकवर्णन है।
चेतगंज रामलीला समिति से जुड़े लोगों और कई स्थानीय समाचार रिपोर्टों में यह दावा मिलता है कि बाबा फतेह राम ने अंग्रेजी शासन के दौर में धार्मिक लीला और झांकियों के माध्यम से जनभावनाओं को अभिव्यक्ति देने का रास्ता खोजा था।
कहा जाता है कि धार्मिक आयोजन होने के कारण ब्रिटिश प्रशासन इसे आसानी से रोक नहीं सकता था।
लेकिन यहां इतिहास और लोकस्मृति के बीच अंतर रखना जरूरी है।
बाबा फतेह राम द्वारा अंग्रेजी शासन के विरोध के लिए नक्कटैया का इस्तेमाल करने की बात स्थानीय परंपरा और समिति के विवरणों में मिलती है। इसे किसी विस्तृत औपनिवेशिक अभिलेख से पूरी तरह प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना सावधानी के बिना उचित नहीं होगा।
फिर भी यह कथा महत्वपूर्ण है।
क्योंकि इससे पता चलता है कि काशी में धार्मिक उत्सव केवल पूजा और मनोरंजन तक सीमित नहीं रहे। वे कभी-कभी सामाजिक भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम भी बने।
करवा चौथ के दिन ही क्यों होती है नक्कटैया?
चेतगंज की नक्कटैया की एक खास पहचान है इसका करवा चौथ से संबंध।
यह आयोजन कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी यानी करवा चौथ के अवसर पर किया जाता है। IGNCA के सांस्कृतिक विवरण में भी नक्कटैया को कार्तिक के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी की शाम से जोड़ा गया है।
करवा चौथ उत्तर भारत में विशेष रूप से महिलाओं के व्रत और चंद्रदर्शन से जुड़ा पर्व है। इसलिए नक्कटैया की रात का सांस्कृतिक वातावरण भी इसी दिन की धार्मिक गतिविधियों के बीच बनता है।
हालांकि, नक्कटैया स्वयं करवा चौथ के व्रत की कथा नहीं है।
यह रामायण के शूर्पणखा प्रसंग पर आधारित रामलीला है।
दोनों परंपराएं एक ही तिथि पर दिखाई देती हैं। यही कारण है कि चेतगंज में उस रात धार्मिक वातावरण और लोकउत्सव एक साथ दिखाई देते हैं।
नक्कटैया में शूर्पणखा की नाक काटने का दृश्य
अब उस दृश्य की कल्पना कीजिए जिसके बाद पूरा आयोजन अपने दूसरे चरण में प्रवेश करता है।
चेतगंज में राम, सीता और लक्ष्मण के पात्र सामने हैं।
शूर्पणखा का प्रसंग चल रहा है।
कथा अपने चरम तक पहुंचती है।
फिर लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की नाक काटने का अभिनय होता है।
इसके बाद वातावरण बदल जाता है।
यही नक्कटैया की नाटकीय विशेषता है।
2024 की चेतगंज नक्कटैया की रिपोर्ट में बताया गया कि रात लगभग आठ बजे चेतगंज चौराहे के पास लीला हुई और लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की नाक काटने के बाद आगे का आयोजन शुरू हुआ। उसी रात विशाल शोभायात्रा भी निकली।
यानी यहां रामलीला केवल देखने की चीज नहीं रहती।
उसका अगला अध्याय सड़क पर चलता है।
काशी की गलियों में निकलते हैं लाग-विमान
नक्कटैया की सबसे अलग पहचान है लाग-विमान और झांकियों की शोभायात्रा।
“लाग-विमान” को यहां चलायमान धार्मिक और दृश्यात्मक झांकियों के रूप में समझा जा सकता है। इनमें पौराणिक प्रसंग, धार्मिक पात्र, सामाजिक विषय और समकालीन घटनाओं के दृश्य बनाए जाते हैं।
कई बार इन झांकियों को बेहद विस्तृत रूप दिया जाता है।
कारीगर कई दिनों तक इनकी तैयारी करते हैं।
सजावट होती है।
ढांचे तैयार होते हैं।
पात्रों और प्रसंगों को दृश्य रूप दिया जाता है।
फिर रात में ये झांकियां शहर की सड़कों से गुजरती हैं।
Cultural Heritage of Varanasi के अनुसार, चेतगंज की नक्कटैया अपनी लंबी शोभायात्रा के लिए प्रसिद्ध है। इसमें लाग, मॉडल, दृश्य, चलायमान प्रस्तुतियां तथा पारंपरिक जुलूस का रूप दिखाई देता है।
नक्कटैया की झांकियां सिर्फ धार्मिक क्यों नहीं होतीं?
यहीं नक्कटैया का सबसे दिलचस्प सामाजिक पक्ष सामने आता है।
कई दूसरे धार्मिक आयोजनों में झांकियां मुख्य रूप से देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित होती हैं।
चेतगंज की नक्कटैया में ऐसा नहीं है।
यहां समय के साथ समसामयिक मुद्दों को भी जगह मिली है।
महंगाई हो।
सामाजिक समस्या हो।
देश की कोई महत्वपूर्ण घटना हो।
या कोई राष्ट्रीय मुद्दा।
लाग-विमान इन विषयों को दृश्य रूप में सामने ला सकते हैं।
2015 में Times of India ने रिपोर्ट किया था कि नक्कटैया की शोभायात्रा में महंगाई, सामाजिक समस्याओं और राष्ट्रीय मुद्दों को झांकियों के जरिए प्रस्तुत किया गया था।
2022 में चेतगंज रामलीला समिति ने भी बताया था कि वर्तमान परिवेश और समाज के ज्वलंत मुद्दों को झांकियों, लाग और स्वांग के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
यानी नक्कटैया की रामलीला में कथा पुरानी है।
लेकिन उसकी भाषा समय के साथ बदलती रहती है।
1999 के बाद झांकियों में सामाजिक सरोकार
चेतगंज की नक्कटैया में सामाजिक विषयों को शामिल करने की परंपरा को लेकर एक और महत्वपूर्ण विवरण सामने आता है।
हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में लाग-विमानों को सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर आधारित करने की परंपरा बढ़ी और इसकी एक महत्वपूर्ण शुरुआत 1999 के कारगिल युद्ध के समय से जोड़ी जाती है।
इसके बाद झांकियां केवल पौराणिक कथाओं का प्रदर्शन नहीं रहीं।
वे समाज के लिए एक तरह का दृश्य संवाद बनने लगीं।
यही कारण है कि हर साल नक्कटैया की झांकियों में नया विषय दिखाई दे सकता है।
इस दृष्टि से यह परंपरा स्थिर नहीं है।
यह बदलती रहती है।
लेकिन बदलाव के बीच उसका मूल ढांचा बना रहता है।
नक्कटैया की रात काशी की सड़कें कैसी दिखती हैं?
नक्कटैया का अनुभव केवल लीला देखने से पूरा नहीं होता।
इसका असली रंग उस समय दिखाई देता है जब रात गहरी हो जाती है और झांकियां निकलने लगती हैं।
लहुराबीर से लेकर चेतगंज तक सड़क के दोनों ओर लोगों की भीड़ दिखाई देती है। कई लोग घंटों पहले पहुंच जाते हैं।
छतों पर भी लोग दिखाई देते हैं।
गलियों के मुहानों पर बच्चे जमा रहते हैं।
दुकानों की रोशनी और झांकियों की सजावट मिलकर एक अलग वातावरण बनाती है।
2023 की एक रिपोर्ट में लहुराबीर से चेतगंज तक रातभर लोगों के झांकियों का इंतजार करने और विभिन्न प्रकार की झांकियों के निकलने का वर्णन मिलता है।
यह दृश्य काशी की उस संस्कृति को दिखाता है जिसमें सड़क स्वयं मंच बन जाती है।
हाथी, घोड़े और पारंपरिक जुलूस की छवि
नक्कटैया की पुरानी तस्वीरों और विवरणों में जुलूस का पारंपरिक स्वरूप भी दिखाई देता है।
Cultural Heritage of Varanasi के अनुसार, चेतगंज की नक्कटैया के जुलूस में ऐतिहासिक रूप से चलायमान झांकियों के साथ हाथी, ऊंट और घोड़े भी शामिल रहे हैं।
हालांकि आधुनिक समय में आयोजन की संरचना और व्यवस्थाएं बदल सकती हैं।
इसलिए हर वर्ष समान दृश्य देखने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
फिर भी पारंपरिक जुलूस की छवि नक्कटैया की सांस्कृतिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कारीगरों के बिना नक्कटैया अधूरी है
नक्कटैया के पीछे केवल रामलीला समिति और कलाकार नहीं होते।
इसके पीछे कारीगरों की लंबी मेहनत भी होती है।
एक झांकी को तैयार करने के लिए डिजाइन, ढांचा, सजावट और रंग-सज्जा की जरूरत पड़ती है।
कई बार बड़े आकार की आकृतियां तैयार की जाती हैं।
इस काम में स्थानीय हुनर के साथ पूर्वांचल के दूसरे क्षेत्रों से आने वाले कारीगर भी शामिल होते रहे हैं। 2015 की एक रिपोर्ट में इलाहाबाद, मिर्जापुर, जौनपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों से आए कारीगरों द्वारा झांकियां तैयार करने का उल्लेख किया गया था।
इससे नक्कटैया केवल धार्मिक आयोजन नहीं रह जाती।
यह लोकशिल्प का भी एक अस्थायी प्रदर्शन बन जाती है।
कुछ दिनों के लिए सड़कें एक खुले संग्रहालय की तरह दिखाई देने लगती हैं।
नक्कटैया और काशी की सामुदायिक संस्कृति
काशी की लोकपरंपराओं की एक बड़ी खूबी है कि उनमें दर्शक और कलाकार के बीच की दूरी बहुत कम होती है।
नक्कटैया इसका अच्छा उदाहरण है।
यहां दर्शक केवल कुर्सी पर बैठकर प्रदर्शन नहीं देखते।
वे गलियों में खड़े होते हैं।
छतों पर चढ़ते हैं।
दुकानों के सामने जमा होते हैं।
जुलूस के साथ चलते हैं।
बच्चे पात्रों और झांकियों को देखकर उत्साहित होते हैं।
बुजुर्ग पूरी रात परंपरा को देखते रहते हैं।
इस तरह एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को आयोजन का अनुभव देती है।
यही मौखिक और सामुदायिक परंपरा किसी लोकउत्सव को लंबे समय तक जीवित रखती है।
चेतगंज की नक्कटैया और काशी की दूसरी रामलीलाएं
काशी में रामलीला की एक ही परंपरा नहीं है।
रामनगर की रामलीला अपनी अलग शैली और ऐतिहासिक पहचान रखती है। काशी के अलग-अलग इलाकों में भी रामलीला और नक्कटैया के आयोजन होते रहे हैं।
Cultural Heritage of Varanasi के अनुसार, काशी में अस्सी घाट, खोजवां, शिवपुर और अन्य स्थानों पर भी रामलीला से जुड़े आयोजन होते हैं।
चेतगंज की नक्कटैया इनमें इसलिए अलग है क्योंकि यहां शूर्पणखा प्रसंग के बाद विशाल चलायमान झांकियों की परंपरा प्रमुख बन जाती है।
यानी रामलीला से सड़क उत्सव तक का संक्रमण इसका विशिष्ट गुण है।
क्या नक्कटैया सिर्फ धार्मिक आयोजन है?
अगर केवल रामायण के प्रसंग को देखा जाए, तो यह धार्मिक आयोजन है।
लेकिन पूरे उत्सव को देखें तो तस्वीर बड़ी हो जाती है।
यहां धर्म है।
इसके साथ लोकनाट्य है।
शिल्प है।
सामाजिक टिप्पणी है।
सार्वजनिक मनोरंजन है।
स्थानीय बाजार है।
और सामुदायिक भागीदारी भी है।
इसीलिए नक्कटैया को काशी की जीवित लोक-संस्कृति के उदाहरण के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
यह कोई संग्रहालय में रखी पुरानी चीज नहीं है।
हर वर्ष लोग इसे नए संदर्भ में फिर से बनाते हैं।
बदलते समय के साथ नक्कटैया में क्या बदला?
समय के साथ आयोजन की तकनीक बदली है।
पहले झांकियों की प्रस्तुति का प्रभाव मुख्य रूप से दृश्य शिल्प, रोशनी और भीड़ की भागीदारी पर निर्भर था। अब बिजली की सजावट, आधुनिक सामग्री, बेहतर ध्वनि और नए दृश्य माध्यमों ने इसकी प्रस्तुति को बदल दिया है।
सोशल मीडिया ने भी नक्कटैया की पहुंच बढ़ाई है।
अब कोई व्यक्ति काशी में मौजूद न होकर भी जुलूस की तस्वीरें और वीडियो देख सकता है।
इस बदलाव का सकारात्मक पक्ष है कि परंपरा की पहचान दूर तक पहुंचती है।
लेकिन चुनौती भी है।
अगर उत्सव केवल कैमरे के लिए बनाया जाने लगे, तो उसका स्थानीय भाव कमजोर हो सकता है।
इसलिए आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन जरूरी है।
2024 की नक्कटैया ने क्या दिखाया?
2024 में चेतगंज की नक्कटैया के 138वें वर्ष के आयोजन में 80 झांकियों के शामिल होने की रिपोर्ट सामने आई। रातभर काशी में लोगों की भीड़ रही और झांकियों में समकालीन संदेशों को भी जगह मिली।
यह आंकड़ा आयोजन के विस्तार को समझने में मदद करता है।
हालांकि अलग-अलग वर्षों में झांकियों की संख्या बदल सकती है।
इसी तरह भीड़ के आंकड़े भी स्रोत के अनुसार अलग हो सकते हैं।
इसलिए नक्कटैया को किसी एक संख्या से परिभाषित करने के बजाय उसकी निरंतरता और सामुदायिक भागीदारी पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है।
2025 में भी जारी रही 139 साल पुरानी परंपरा
2025 में हिन्दुस्तान ने चेतगंज की नक्कटैया के 139वें संस्करण की रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें सैकड़ों लाग-विमानों और झांकियों वाली रातभर चलने वाली परंपरा का उल्लेख किया गया।
यह तथ्य अपने आप में दिलचस्प है।
19वीं सदी के अंतिम वर्षों में शुरू हुई बताई जाने वाली परंपरा ने बदलते राजनीतिक, सामाजिक और तकनीकी वातावरण के बीच अपना रूप बनाए रखा।
यही किसी लोक उत्सव की वास्तविक ताकत है।
वह समय के साथ बदलता है।
लेकिन खत्म नहीं होता।
नक्कटैया में काशी खुद को कैसे देखती है?
शायद यही इस उत्सव की सबसे खूबसूरत बात है।
रामायण का प्रसंग मंच पर होता है।
लेकिन उसके बाद जो झांकियां निकलती हैं, उनमें काशी अपने समय को देखती है।
कभी देश का कोई बड़ा मुद्दा सामने आता है।
कभी सामाजिक समस्या।
कभी तकनीकी उपलब्धि।
कभी राष्ट्रीय भावना।
इसलिए नक्कटैया अतीत और वर्तमान के बीच एक पुल बन जाती है।
रामायण की कथा पुरानी है।
लेकिन उसे देखने वाली आंखें हर साल नई होती हैं।
और शायद इसी वजह से यह परंपरा आज भी लोगों को आकर्षित करती है।
नक्कटैया को देखने जाएं तो क्या ध्यान रखें?
अगर कोई व्यक्ति चेतगंज की नक्कटैया पहली बार देखना चाहता है, तो इसे सामान्य शाम के कार्यक्रम की तरह नहीं समझना चाहिए।
मुख्य आकर्षण रात में होता है और भीड़ बहुत अधिक हो सकती है।
इसलिए सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल सुविधाजनक हो सकता है। भीड़भाड़ वाले मार्गों में निजी वाहन ले जाना कठिन हो सकता है।
साथ ही, जुलूस के दौरान रास्ते बंद या परिवर्तित हो सकते हैं। यात्रा से पहले स्थानीय प्रशासन और आयोजन समिति की ताजा सूचना देखना बेहतर है।
बच्चों और बुजुर्गों के साथ जा रहे हों तो भीड़ को ध्यान में रखकर स्थान चुनना चाहिए।
और सबसे जरूरी बात—
नक्कटैया को केवल फोटो खींचने का आयोजन न समझें।
उसके पीछे की रामलीला, कारीगरों की मेहनत और काशी की सामुदायिक संस्कृति को भी देखने की कोशिश करें।
नक्कटैया की सबसे बड़ी खूबी क्या है?
इस सवाल का एक शब्द में उत्तर देना मुश्किल है।
क्या यह रामायण है?
हां।
क्या यह रामलीला है?
हां।
क्या यह मेला है?
हां।
क्या यह लोकशिल्प है?
बिल्कुल।
क्या इसमें सामाजिक संदेश होते हैं?
कई वर्षों में रहे हैं।
यही मिश्रण नक्कटैया को खास बनाता है।
काशी ने रामायण के एक छोटे प्रसंग को अपने शहर की सामूहिक स्मृति में बदल दिया।
उस स्मृति में धर्म भी है और लोकजीवन भी।
मंच भी है और सड़क भी।
परंपरा भी है और वर्तमान भी।
FAQs: काशी की नक्कटैया
1. नक्कटैया क्या है?
नक्कटैया काशी की रामलीला परंपरा से जुड़ा एक प्रसिद्ध लोकउत्सव है। इसमें रामायण के शूर्पणखा प्रसंग का मंचन किया जाता है। इसके बाद विशेष रूप से चेतगंज में लाग-विमानों और झांकियों की बड़ी शोभायात्रा निकलती है।
2. चेतगंज की नक्कटैया कब शुरू हुई थी?
उपलब्ध स्रोतों में वर्ष को लेकर थोड़ा अंतर है। IGNCA इसे लगभग 1887 से जोड़ता है, जबकि चेतगंज रामलीला समिति और कुछ समाचार रिपोर्ट 1888 बताती हैं। दोनों स्थितियों में इसकी शुरुआत 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में बाबा फतेह राम से जुड़ती है।
3. नक्कटैया करवा चौथ के दिन क्यों होती है?
चेतगंज की नक्कटैया कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी यानी करवा चौथ के अवसर पर आयोजित होती है। यह रामायण के शूर्पणखा प्रसंग की लीला है। करवा चौथ की धार्मिक परंपरा और नक्कटैया का आयोजन एक ही तिथि पर पड़ने के कारण दोनों का संबंध दिखाई देता है।
4. नक्कटैया में किसकी नाक काटी जाती है?
रामायण के जिस प्रसंग का मंचन नक्कटैया में किया जाता है, उसमें लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की नाक काटने की कथा दिखाई जाती है। यह धार्मिक और पौराणिक कथा का नाट्य रूपांतरण है, जिसे ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं देखना चाहिए।
5. नक्कटैया की झांकियों को क्या कहते हैं?
चेतगंज की नक्कटैया में चलायमान झांकियों को लाग-विमान कहा जाता है। इनमें धार्मिक और पौराणिक प्रसंगों के साथ समय-समय पर सामाजिक तथा समसामयिक विषय भी प्रस्तुत किए जाते हैं।
6. क्या नक्कटैया सिर्फ धार्मिक आयोजन है?
नहीं। धार्मिक लीला इसका मूल आधार है, लेकिन इसके साथ लोकशिल्प, जुलूस, सामाजिक संदेश, झांकियां और सामुदायिक भागीदारी भी जुड़ी है। इसलिए इसे काशी की जीवित लोक-सांस्कृतिक परंपरा के रूप में भी समझा जा सकता है।
7. नक्कटैया में अंग्रेजों के विरोध की क्या कहानी है?
स्थानीय परंपरा और चेतगंज रामलीला समिति से जुड़े विवरणों के अनुसार, बाबा फतेह राम ने अंग्रेजी शासन के समय धार्मिक आयोजन के माध्यम से जनभावनाओं को अभिव्यक्ति देने का रास्ता बनाया था। यह विवरण स्थानीय इतिहास और मौखिक परंपरा में मिलता है; इसे विस्तृत औपनिवेशिक अभिलेखों से प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
8. नक्कटैया कहां आयोजित होती है?
चेतगंज की नक्कटैया काशी की सबसे प्रसिद्ध नक्कटैया मानी जाती है। इसके लीला और जुलूस का प्रमुख क्षेत्र चेतगंज, लहुराबीर और मलदहिया के आसपास रहा है। इसके अलावा वाराणसी के दूसरे इलाकों में भी नक्कटैया की स्थानीय परंपराएं मिलती हैं।
निष्कर्ष: जब रामायण काशी की गलियों में उतर आती है
काशी की नक्कटैया को समझने के लिए केवल रामायण का एक प्रसंग जान लेना पर्याप्त नहीं है।
इसके पीछे एक लंबी लोकपरंपरा है।
चेतगंज की रामलीला से जुड़ी यह परंपरा 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में बाबा फतेह राम के नाम के साथ सामने आती है। शुरुआत के वर्ष को लेकर 1887 और 1888, दोनों उल्लेख मिलते हैं। इसलिए इतिहास लिखते समय इस अंतर को स्वीकार करना अधिक ईमानदार है।
समय के साथ नक्कटैया ने अपना संसार बड़ा किया।
रामायण की लीला मंच पर रही। मगर उसकी कहानी सड़कों तक पहुंच गई। लाग-विमान और झांकियां इस आयोजन की पहचान बने। कारीगरों ने उन्हें आकार दिया। स्थानीय लोगों ने उन्हें अपनाया। और कई वर्षों में समकालीन मुद्दों ने भी इन झांकियों में जगह बनाई।
यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।
नक्कटैया अतीत को दोहराती जरूर है, लेकिन केवल अतीत में नहीं रहती।
वह हर साल अपने समय को भी देखती है।
शायद इसलिए आधी रात को जब चेतगंज की सड़कों पर झांकियां निकलती हैं और हजारों आंखें उन्हें देखती हैं, तब वहां सिर्फ रामायण का मंचन नहीं हो रहा होता।
वहां काशी अपनी सामूहिक स्मृति को फिर से जीवित कर रही होती है।
और यही वजह है कि नक्कटैया केवल एक मेला नहीं, बल्कि बनारस की उन जीवित परंपराओं में से है जिन्हें देखने के साथ-साथ समझना भी जरूरी है।